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द्रोण पर्व
अध्याय १६९
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सञ्जय़ उवाच
कर्ता त्वं कर्मणोग्रस्य नाहं वृष्णिकुलाधम |  ३१   क
पापानां च त्वमावासः कर्मणां मा पुनर्वद ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति