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शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
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भीष्म उवाच
वक्तव्ये तु यदा वक्ता श्रोतारमवमन्यते |  ९२   क
स्वार्थमाह परार्थं वा तदा वाक्यं न रोहति ||  ९२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति