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द्रोण पर्व
अध्याय १६९
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सञ्जय़ उवाच
ततोऽभिपत्य पाञ्चाल्यं संरम्भेणेदमव्रवीत् |  ४२   क
न त्वां वक्ष्यामि परुषं हनिष्ये त्वां वधक्षमम् ||  ४२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति