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वन पर्व
अध्याय ५१
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नारद उवाच
आवय़ोः कुशलं देव सर्वत्रगतमीश्वर |  १४   क
लोके च मघवन्कृत्स्ने नृपाः कुशलिनो विभो ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति