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द्रोण पर्व
अध्याय १६९
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सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालानां च वार्ष्णेय़ समुद्रान्तां विचिन्वताम् |  ५०   क
नान्यदस्ति परं मित्रं यथा पाण्डववृष्णय़ः ||  ५०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति