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द्रोण पर्व
अध्याय १६९
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सञ्जय़ उवाच
स एवं सर्वधर्मज्ञो मित्रधर्ममनुस्मरन् |  ५२   क
निय़च्छ मन्युं पाञ्चाल्यात्प्रशाम्य शिनिपुङ्गव ||  ५२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति