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द्रोण पर्व
अध्याय १६९
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सञ्जय़ उवाच
पार्षतस्य क्षम त्वं वै क्षमतां तव पार्षतः |  ५३   क
वय़ं क्षमय़ितारश्च किमन्यत्र शमाद्भवेत् ||  ५३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति