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शल्य पर्व
अध्याय ११
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सञ्जय़ उवाच
पाण्डुपुत्रेण वै तस्य केतुं छिन्नं महात्मना |  ५७   क
निपतन्तमपश्याम गिरिशृङ्गमिवाहतम् ||  ५७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति