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द्रोण पर्व
अध्याय १६३
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सञ्जय़ उवाच
नाज्ञाय़त ततः किञ्चित्पुनरेव विशां पते |  ४८   क
प्रवृत्ते तुमुले युद्धे द्रोणपाण्डवय़ोर्मृधे ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति