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द्रोण पर्व
अध्याय ११७
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सञ्जय़ उवाच
अथाव्रवीद्धृष्टमना वासुदेवं धनञ्जय़ः |  ५०   क
पश्य वृष्णिप्रवीरेण क्रीडन्तं कुरुपुङ्गवम् |  ५०   ख
महाद्विपेनेव वने मत्तेन हरिय़ूथपम् ||  ५०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति