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उद्योग पर्व
अध्याय २७
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सञ्जय़ उवाच
इह क्षेत्रे क्रिय़ते पार्थ कार्यं; न वै किञ्चिद्विद्यते प्रेत्य कार्यम् |  १२   क
कृतं त्वय़ा पारलोक्यं च कार्यं; पुण्यं महत्सद्भिरनुप्रशस्तम् ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति