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आदि पर्व
अध्याय १७
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सूत उवाच
ततो मही प्रविचलिता सकानना; महाद्रिपाताभिहता समन्ततः |  २६   क
परस्परं भृशमभिगर्जतां मुहू; रणाजिरे भृशमभिसम्प्रवर्तिते ||  २६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति