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आदि पर्व
अध्याय १७
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सूत उवाच
नरस्ततो वरकनकाग्रभूषणै; र्महेषुभिर्गगनपथं समावृणोत् |  २७   क
विदारय़न्गिरिशिखराणि पत्रिभि; र्महाभय़ेऽसुरगणविग्रहे तदा ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति