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सौप्तिक पर्व
अध्याय १७
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वासुदेव उवाच
हरिकेशस्तथेत्युक्त्वा भूतानां दोषदर्शिवान् |  ११   क
दीर्घकालं तपस्तेपे मग्नोऽम्भसि महातपाः ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति