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सौप्तिक पर्व
अध्याय १७
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वासुदेव उवाच
सुमहान्तं ततः कालं प्रतीक्ष्यैनं पितामहः |  १२   क
स्रष्टारं सर्वभूतानां ससर्ज मनसापरम् ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति