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सौप्तिक पर्व
अध्याय १७
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वासुदेव उवाच
सोऽव्रवीत्पितरं दृष्ट्वा गिरिशं मग्नमम्भसि |  १३   क
यदि मे नाग्रजस्त्वन्यस्ततः स्रक्ष्याम्यहं प्रजाः ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति