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सौप्तिक पर्व
अध्याय १७
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वासुदेव उवाच
वहुरूपाः प्रजा दृष्ट्वा विवृद्धाः स्वेन तेजसा |  २१   क
चुक्रोध भगवान्रुद्रो लिङ्गं स्वं चाप्यविध्यत ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति