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आदि पर्व
अध्याय १८५
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वैशम्पाय़न उवाच
तौ पार्थिवानां मिषतां नरेन्द्र; कृष्णामुपादाय़ गतौ नराग्र्यौ |  ६   क
विभ्राजमानाविव चन्द्रसूर्यौ; वाह्यां पुराद्भार्गवकर्मशालाम् ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति