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सौप्तिक पर्व
अध्याय १७
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वासुदेव उवाच
सोऽव्रवीज्जातसंरम्भस्तदा लोकगुरुर्गुरुम् |  २४   क
प्रजाः सृष्टाः परेणेमाः किं करिष्याम्यनेन वै ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति