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सौप्तिक पर्व
अध्याय १७
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वासुदेव उवाच
प्रसन्नो हि महादेवो दद्यादमरतामपि |  ७   क
वीर्यं च गिरिशो दद्याद्येनेन्द्रमपि शातय़ेत् ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति