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स्त्री पर्व
अध्याय १७
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वैशम्पाय़न उवाच
अपश्यं कृष्ण पृथिवीं धार्तराष्ट्रानुशासनात् |  २०   क
पूर्णां हस्तिगवाश्वस्य वार्ष्णेय़ न तु तच्चिरम् ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति