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शान्ति पर्व
अध्याय ३०३
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याज्ञवल्क्य उवाच
पुष्करं त्वन्यदेवात्र तथान्यदुदकं स्मृतम् |  १७   क
न चोदकस्य स्पर्शेन लिप्यते तत्र पुष्करम् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति