स्त्री पर्व  अध्याय १७

वैशम्पाय़न उवाच

प्रकीर्णकेशां सुश्रोणीं दुर्योधनभुजाङ्कगाम् |  २३   क
रुक्मवेदीनिभां पश्य कृष्ण लक्ष्मणमातरम् ||  २३   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति