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स्त्री पर्व
अध्याय १७
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वैशम्पाय़न उवाच
सुगूढजत्रु विपुलं हारनिष्कनिषेवितम् |  ४   क
वारिणा नेत्रजेनोरः सिञ्चन्ती शोकतापिता |  ४   ख
समीपस्थं हृषीकेशमिदं वचनमव्रवीत् ||  ४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति