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शान्ति पर्व
अध्याय १७
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युधिष्ठिर उवाच
मानुषान्कामभोगांस्त्वमैश्वर्यं च प्रशंससि |  ६   क
अभोगिनोऽवलाश्चैव यान्ति स्थानमनुत्तमम् ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति