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वन पर्व
अध्याय २८४
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वैशम्पाय़न उवाच
यदि दास्यसि कर्ण त्वं सहजे कुण्डले शुभे |  १८   क
आय़ुषः प्रक्षय़ं गत्वा मृत्योर्वशमुपेष्यसि ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति