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द्रोण पर्व
अध्याय १६०
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सञ्जय़ उवाच
तं न देवा न गन्धर्वा न यक्षा न च राक्षसाः |  १४   क
उत्सहन्ते रणे सोढुं कुपितं सव्यसाचिनम् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति