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अनुशासन पर्व
अध्याय १७
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उपमन्युरु उवाच
संय़ोगो वर्धनो वृद्धो महावृद्धो गणाधिपः |  ११६   क
नित्य आत्मसहाय़श्च देवासुरपतिः पतिः ||  ११६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति