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शान्ति पर्व
अध्याय २१७
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वलिरु उवाच
मैवं शक्र पुनः कार्षीः शान्तो भवितुमर्हसि |  ५९   क
त्वामप्येवङ्गतं त्यक्त्वा क्षिप्रमन्यं गमिष्यति ||  ५९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति