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अनुशासन पर्व
अध्याय १७
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उपमन्युरु उवाच
स्वर्गद्वारं प्रजाद्वारं मोक्षद्वारं त्रिविष्टपम् |  १४०   क
निर्वाणं ह्लादनं चैव व्रह्मलोकः परा गतिः ||  १४०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति