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अनुशासन पर्व
अध्याय १७
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उपमन्युरु उवाच
सर्वदेवमय़ोऽचिन्त्यो देवतात्मात्मसम्भवः |  १४४   क
उद्भिदस्त्रिक्रमो वैद्यो विरजो विरजोम्वरः ||  १४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति