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अनुशासन पर्व
अध्याय १७
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उपमन्युरु उवाच
ललाटाक्षो विश्वदेहो हरिणो व्रह्मवर्चसः |  १४८   क
स्थावराणां पतिश्चैव निय़मेन्द्रिय़वर्धनः ||  १४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति