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अनुशासन पर्व
अध्याय १७
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उपमन्युरु उवाच
निर्विघ्ना निश्चला रुद्रे भक्तिरव्यभिचारिणी |  १६०   क
तस्यैव च प्रसादेन भक्तिरुत्पद्यते नृणाम् |  १६०   ख
यय़ा यान्ति परां सिद्धिं तद्भावगतचेतसः ||  १६०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति