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अनुशासन पर्व
अध्याय १७
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उपमन्युरु उवाच
यः पठेत शुचिर्भूत्वा व्रह्मचारी जितेन्द्रिय़ः |  १७१   क
अभग्नय़ोगो वर्षं तु सोऽश्वमेधफलं लभेत् ||  १७१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति