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अनुशासन पर्व
अध्याय १७
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उपमन्युरु उवाच
तदाप्रभृति चैवाय़मीश्वरस्य महात्मनः |  २१   क
स्तवराजेति विख्यातो जगत्यमरपूजितः |  २१   ख
व्रह्मलोकादय़ं चैव स्तवराजोऽवतारितः ||  २१   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति