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शान्ति पर्व
अध्याय २१७
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वलिरु उवाच
नैतदस्मत्कृतं शक्र नैतच्छक्र त्वय़ा कृतम् |  ३५   क
यत्त्वमेवङ्गतो वज्रिन्यद्वाप्येवङ्गता वय़म् ||  ३५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति