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वन पर्व
अध्याय १४६
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वैशम्पाय़न उवाच
सशष्पकवलैः स्वस्थैरदूरपरिवर्तिभिः |  २८   क
भय़स्याज्ञैश्च हरिणैः कौतूहलनिरीक्षितः ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति