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द्रोण पर्व
अध्याय १०६
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सञ्जय़ उवाच
कर्णो जाम्वूनदैर्जालैः सञ्छन्नान्वातरंहसः |  ३०   क
विव्याध तुरगान्वीरः पञ्चभिः पञ्चभिः शरैः ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति