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अनुशासन पर्व
अध्याय १७
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उपमन्युरु उवाच
जटी चर्मी शिखण्डी च सर्वाङ्गः सर्वभावनः |  ३१   क
हरिश्च हरिणाक्षश्च सर्वभूतहरः प्रभुः ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति