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अनुशासन पर्व
अध्याय १७
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उपमन्युरु उवाच
गजहा दैत्यहा लोको लोकधाता गुणाकरः |  ४७   क
सिंहशार्दूलरूपश्च आर्द्रचर्माम्वरावृतः ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति