अनुशासन पर्व  अध्याय १७

उपमन्युरु उवाच

वसुवेगो महावेगो मनोवेगो निशाचरः |  ६६   क
सर्वावासी श्रिय़ावासी उपदेशकरो हरः ||  ६६   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति