अनुशासन पर्व  अध्याय १७

उपमन्युरु उवाच

वहुप्रसादः स्वपनो दर्पणोऽथ त्वमित्रजित् |  ७८   क
वेदकारः सूत्रकारो विद्वान्समरमर्दनः ||  ७८   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति