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भीष्म पर्व
अध्याय ५०
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सञ्जय़ उवाच
ततः शरसहस्रेण संनिवार्य महारथान् |  १०१   क
हय़ान्काञ्चनसंनाहान्भीमस्य न्यहनच्छरैः ||  १०१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति