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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५४
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वैशम्पाय़न उवाच
तमुवाच प्रसन्नात्मा गोविन्दो जनमेजय़ |  ९   क
वरं वृणीष्वेति तदा तमुत्तङ्कोऽव्रवीदिदम् ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति