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अनुशासन पर्व
अध्याय १७
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उपमन्युरु उवाच
स्नेहनोऽस्नेहनश्चैव अजितश्च महामुनिः |  ८७   क
वृक्षाकारो वृक्षकेतुरनलो वाय़ुवाहनः ||  ८७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति