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अनुशासन पर्व
अध्याय १७
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उपमन्युरु उवाच
अगणश्चैव लोपश्च महात्मा सर्वपूजितः |  ९३   क
शङ्कुस्त्रिशङ्कुः सम्पन्नः शुचिर्भूतनिषेवितः ||  ९३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति