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आदि पर्व
अध्याय १८५
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वैशम्पाय़न उवाच
तत्रोपविष्टार्चिरिवानलस्य; तेषां जनित्रीति मम प्रतर्कः |  ७   क
तथाविधैरेव नरप्रवीरै; रुपोपविष्टैस्त्रिभिरग्निकल्पैः ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति