आश्वमेधिक पर्व  अध्याय १७

वासुदेव उवाच

ततस्तस्योपसङ्गृह्य पादौ प्रश्नान्सुदुर्वचान् |  १   क
पप्रच्छ तांश्च सर्वान्स प्राह धर्मभृतां वरः ||  १   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति