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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १७
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सिद्ध उवाच
रसातिय़ुक्तमन्नं वा दिवास्वप्नं निषेवते |  १२   क
अपक्वानागते काले स्वय़ं दोषान्प्रकोपय़न् ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति