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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १७
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सिद्ध उवाच
भिन्नसन्धिरथ क्लेदमद्भिः स लभते नरः |  २०   क
यथा पञ्चसु भूतेषु संश्रितत्वं निगच्छति |  २०   ख
शैत्यात्प्रकुपितः काय़े तीव्रवाय़ुसमीरितः ||  २०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति