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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १७
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सिद्ध उवाच
इहैवाशुभकर्मा तु कर्मभिर्निरय़ं गतः |  ३४   क
अवाक्स निरय़े पापो मानवः पच्यते भृशम् |  ३४   ख
तस्मात्सुदुर्लभो मोक्ष आत्मा रक्ष्यो भृशं ततः ||  ३४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति